जानवर भी देते हैं इंसानियत की मिसाल!

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  सरकार, हमें सुकून के साथ बस दो वक़्त की रोटी चाहिए: लोगों ने बताया ग़ज़बपोस्ट को  
 
    
 
  

फैसला आ चुका है. लोग इस पर अमल भी कर रहे हैं. पूरा देश एक साथ कतार में खड़ा है, एक तरह से इसे लाइन वाली छावनी भी कह सकते हैं. हर चेहरे पर शिकन और परेशानी है. कोई बीमार है, तो किसी का कोई अपना बीमार है, फ़िर भी लोग कतार में हैं. वजह- 'बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया'. विपक्षी पार्टियां इसे आर्थिक इमरजेंसी बता रही हैं, वहीं सरकार और संबंधित मंत्री इसे बस कुछ दिनों का मामला बता रहे हैं. शहरों में रहने वाले एलाइट क्लास के पास क्रेडिट, डेबिट और मोबाइल मनी है. वे इसकी मदद से अपनी ज़रुरत की सभी चीज़ों को ख़रीद ले रहे हैं, मगर गांवों में रहने वाले ग़रीबों के पास ठेंगा है.  Read More

  
 
  

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एक ट्वीट पर लोगों की मदद करने वाली सुषमा स्वराज को किडनी देने के लिए आये देश भर से फोन

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पिछले कुछ दिनों से किडनी फेलियर की समस्या के कारण हॉस्पिटल में भर्ती हैं. विदेशों में बैठे भारतीय लोगों की एक ट्वीट पर मदद करने वाली सुषमा को 7 नवंबर को दिल्ली के एम्स में भर्ती किया गया था. सुषमा स्वराज देश के इतने लोकप्रिय नेताओं में शुमार में हैं कि किडनी फेलियर की ख़बर सुनते ही देश के कई हिस्सों से लोगों ने एम्स को किडनी डोनेट करने का ऑफर भेजा है.


  
  


बकरियों के झुंड को एक मासूम बंदर ने बनाया अपना परिवार, मां मानकर चिपका रहता है एक बकरी से

एक मासूम जानवर को ऐसी मां मिली है, जो न उसकी जाति की है और न ही उसके समुदाय की. फिर भी वह उस अनजान मां और परिवार के साथ खुश है. उसे किसी तरह की शिकायत नहीं है. दरअसल, हम इंसान इंसानियत को ताक पर रख कर जाति, धर्म और समुदाय के खाके में ऐसे सिमट गये हैं कि जानवर भी हमारे रंग-रूप को पहचानने लग गया है. अपनी मां से बिछड़े एक मासूम बंदर को सुरक्षा के लिहाज से इंसानों के पास आना चाहिए था. लेकिन उसने ऐसा करने के बजाय इंसानों से ज़्यादा सुरक्षित बकरियों के झुंड को चुना और उन्हीं बकरियों में से एक को अपनी मां भी मान लिया.


  
 
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